अरावली केस क्या है? पूरा मामला सरल शब्दों में
अरावली पर्वतमाला की पहचान और कानूनी परिभाषा को लेकर वर्षों से भ्रम की स्थिति बनी हुई थी। अलग-अलग राज्यों में अरावली की अलग परिभाषाएँ लागू थीं, जिससे खनन, निर्माण और पर्यावरण संरक्षण के मामलों में असंगति बनी रहती थी।
इसी संदर्भ में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक वैज्ञानिक परिभाषा प्रस्तुत की, जिसे हालिया सुनवाई में स्वीकार किया गया। इसके अनुसार—
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जिस भू-भाग की ऊँचाई आसपास के सामान्य धरातल से कम से कम 100 मीटर अधिक है, वही “अरावली हिल” मानी जाएगी।
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यदि ऐसी दो या अधिक पहाड़ियाँ 500 मीटर के दायरे में हों, तो उन्हें “अरावली रेंज” कहा जाएगा।
सरकार का तर्क है कि इससे पूरे देश में अरावली की एक समान और स्पष्ट पहचान सुनिश्चित होगी। परंतु असली विवाद यहीं से शुरू होता है।
राजस्थान को सबसे बड़ा नुकसान क्यों?
सरकारी और तकनीकी अध्ययनों के अनुसार राजस्थान में मौजूद अरावली की लगभग 90 प्रतिशत पहाड़ियाँ 100 मीटर ऊँचाई की शर्त पूरी नहीं करतीं। इसका सीधा अर्थ यह है कि—
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राजस्थान की केवल 8–10% पहाड़ियाँ ही कानूनी रूप से अरावली मानी जाएँगी।
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शेष लगभग 90% पहाड़ियाँ पर्यावरणीय संरक्षण कानूनों से बाहर हो सकती हैं।
यह स्थिति इसलिए भी भयावह है क्योंकि अरावली का सबसे बड़ा और सबसे संवेदनशील हिस्सा राजस्थान में ही स्थित है। यही छोटी और मध्यम ऊँचाई वाली पहाड़ियाँ—
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वर्षा जल को रोककर भूजल पुनर्भरण करती हैं
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धूल भरी आँधियों और लू को रोकती हैं
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थार रेगिस्तान के विस्तार पर प्राकृतिक रोक लगाती हैं
पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक प्रभाव
विशेषज्ञों के अनुसार यदि ये पहाड़ियाँ संरक्षण से बाहर हो गईं, तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे—
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अलवर, जयपुर, दौसा, सीकर, झुंझुनूं, उदयपुर, राजसमंद जैसे जिलों में भूजल स्तर और नीचे जाएगा
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सूखे की तीव्रता बढ़ेगी और कृषि पर संकट गहराएगा
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खनन और अनियंत्रित निर्माण को खुली छूट मिल जाएगी
राजस्थान पहले से ही जल-संकटग्रस्त राज्य है। ऐसे में अरावली का कमजोर होना केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि आर्थिक अस्थिरता, स्वास्थ्य संकट और सामाजिक तनाव को जन्म देगा।
अरावली केवल ऊँचाई नहीं, एक पारिस्थितिक तंत्र है
अरावली की पहचान केवल मीटर में मापी जाने वाली ऊँचाई से नहीं की जा सकती। यह एक भूगर्भीय और पारिस्थितिक संरचना है, जो लाखों वर्षों में विकसित हुई है।
छोटी पहाड़ियाँ भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वही—
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जलधाराओं को जीवित रखती हैं
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जंगलों और जैव-विविधता को सहारा देती हैं
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रेगिस्तान को आबादी वाले क्षेत्रों तक बढ़ने से रोकती हैं
इन्हें खनन के लिए खोलना दिल्ली और पूर्वी राजस्थान तक मरुस्थलीकरण को न्योता देना है।
जनता क्यों जागे? यह लड़ाई किसकी है?
यह लड़ाई केवल अदालत या सरकार की नहीं है—यह लड़ाई समाज की, किसान की और बच्चों के भविष्य की है।
आज यदि अरावली कागज़ों से मिटाई जा रही है, तो कल—
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किसान के खेत सूखेंगे
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शहरों में पानी महँगा होगा
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बच्चों को प्रदूषित हवा विरासत में मिलेगी
सबसे खतरनाक सच यह है कि अरावली का नुकसान पलटा नहीं जा सकता। एक बार पहाड़ कटे और जलधाराएँ टूटीं, तो उन्हें वापस लाने में सदियाँ लगती हैं।
निष्कर्ष : अरावली बचेगी तो राजस्थान बचेगा
विकास का अर्थ प्रकृति का विनाश नहीं हो सकता। असली विकास वही है जो मानव और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए।
अरावली केवल पहाड़ नहीं—यह राजस्थान की जीवनरेखा है।
यदि आज समाज ने सवाल नहीं उठाए, तो कल पछताने के अलावा कुछ शेष नहीं बचेगा।
अरावली बचाओ, क्योंकि अगर अरावली बचेगी, तभी राजस्थान बचेगा।
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